अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
श्लोक 10 . 25

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् |
यज्ञानां जपयज्ञोSस्मि स्थावराणां हिमालयः || २५ ||

महा-ऋषीणाम् – महर्षियों में; भृगुः – भृगु; अहम् – मैं हूँ; गिराम् – वाणी में; अस्मि – हूँ; एकम्-अक्षरम् – प्रणव; यज्ञानाम् – समस्त यज्ञों में; जप-यज्ञः – कीर्तन, जप; अस्मि – हूँ; स्थावराणाम् – जड़ पदार्थों में; हिमालयः – हिमालय पर्वत |


भावार्थ

मैं महर्षियों में भृगु हूँ, वाणी में दिव्य ओंकार हूँ, समस्त यज्ञों में पवित्र नाम का कीर्तन (जप) तथा समस्त अचलों में हिमालय हूँ |
तात्पर्य


ब्रह्माण्ड के प्रथम ब्रह्मा ने विभिन्न योनियों के विस्तार के लिए कई पुत्र उत्पन्न किये | इनमें से भृगु सबसे शक्तिशाली मुनि थे | समस्त दिव्य ध्वनियों में ओंकार कृष्ण का रूप है | समस्त यज्ञों में हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे | हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे – का जप कृष्ण का सर्वाधिक शुद्ध रूप है | कभी-कभी पशु यज्ञ की भी संस्तुति की जाती है, किन्तु हरे कृष्ण यज्ञ में हिंसा का प्रश्न ही नहीं उठता | यह सबसे सरल तथा शुद्धतम यज्ञ है | समस्त जगत में जो कुछ शुभ है, वह कृष्ण का रूप है | अतः संसार का सबसे बड़ा पर्वत हिमालय भी उन्हीं का स्वरूप है | पिछले श्लोक में मेरु का उल्लेख हुआ है, परन्तु मेरु तो कभी-कभी सचल होता है, लेकिन हिमालय कभी चल नहीं है | अतः हिमालय मेरु से बढ़कर है |