अध्याय 18 : उपसंहार – संन्यास की सिद्धि
 

श्लोक 18.59

यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे |


मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति || ५९ ||
 


यत् – यदि; अहंकारम् – मिथ्या अहंकार की; आश्रित्य – शरण लेकर; न योत्स्ये – मैं नहीं लडूँगा; इति – इस प्रकार; मन्यसे – तुम सोचते हो; मिथ्या एष – तो वह सब झूठ है; व्यवसायः – संकल्प; ते – तुम्हारा; प्रकृतिः – भौतिक प्रकृति; त्वाम् – तुमको; नियोक्ष्यति – लगा लेगी ।

भावार्थ

यदि तुम मेरे निर्देशानुसार कर्म नहीं करते और युद्ध में प्रवृत्त नहीं होते हो, तो तुम कुमार्ग पर जाओगे । तुम्हें अपने स्वभाव वश युद्ध में लगना पड़ेगा ।

 

 

तात्पर्य



अर्जुन एक सैनिक था और क्षत्रिय स्वभाव लेकर जन्मा था । अतएव उसका स्वाभाविक कर्तव्य था कि वह युद्ध करे । लेकिन मिथ्या अहंकारवश वह डर रहा था कि अपने गुरु, पितामह तथा मित्रों का वध करके वह पाप का भागी होगा । वास्तव में वह अपने को अपने कर्मों का स्वामी जान रहा था, मानो वही ऐसे कर्मों के अच्छे-बुरे फलों का निर्देशन कर रहा हो । वह भूल गया कि वहाँ पर साक्षात् भगवान् उपस्थित हैं और उसे युद्ध करने का आदेश दे रहे हैं । यही है बद्धजीव की विस्मृति । परम पुरुष निर्देश देते हैं कि क्या अच्छा है और क्या बुरा है और मनुष्य को जीवन-सिद्धि प्राप्त करने के लिए केवल कृष्ण भावना मृत में कर्म करना है । कोई भी अपने भाग्य का निर्णय ऐसे नहीं कर सकता जैसे भगवान् कर सकते हैं । अतएव सर्वोत्तम मार्ग यही है कि परमेश्र्वर से निर्देश प्राप्त करके कर्म किया जाय । भगवान् या भगवान् के प्रतिनिधि स्वरूप गुरु के आदेश की वह कभी उपेक्षा न करे । भगवान् के आदेश को बिना किसी हिचक के पूरा करने के लिए वह कर्म करे – इससे सभी परिस्थियों में सुरक्षित रहा जा सकेगा ।
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