अध्याय 16 : दैवी और आसुरी स्वभाव
 

श्लोक 16.9


एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोSल्पबुद्धयः |


प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोSहिताः || ९ ||
 
 
 

एताम् – इस; दृष्टिम् – दृष्टि को; अवष्टभ्य – स्वीकार करके; नष्ट – खोकर; आत्मानः – अपने आप; अल्प-बुद्धयः – अल्पज्ञानी; प्रभवन्ति – फूलते-फलते हैं; उग्र-कर्माणः – कष्ट कारक कर्मों में प्रवृत्त; क्षयाय – विनाश के लिए; जगतः – संसार का; अहिताः – अनुपयोगी । |

भावार्थ


 ऐसे निष्कर्मों का अनुगमन करते हुए आसुरी लोग, जिन्होंने आत्म-ज्ञान खो दिया है और जो बुद्धि हीन हैं, ऐसे अनुपयोगी एवं भयावह कार्यों में प्रवृत्त होते हैं जो संसार का विनाश करने के लिए होता है ।

 
 
 तात्पर्य
 
 

आसुरी लोग ऐसे कार्यों में व्यस्त रहते हैं जिससे संसार का विनाश हो जाये । भगवान् यहाँ कहते हैं कि वे कम बुद्धि वाले हैं । भौतिक वादी, जिन्हें ईश्र्वर का कोई बोध नहीं होता, सोचते हैं कि वे प्रगति कर रहे हैं । लेकिन भगवद्गीता के अनुसार वे बुद्धिहीन तथा समस्त विचारों से शून्य होते हैं । वे इस भौतिक जगत् का अधिक से अधिक भोग करने का प्रयत्न करते हैं, अतएव इन्द्रिय तृप्ति के लिए कुछ न कुछ नया अविष्कार करते रहते हैं । ऐसे भौतिक अविष्कारों को मानव सभ्यता का विकास माना जाता है, लेकिन इसका दुष्परिणाम यह होता है कि लोग अधिकाधिक हिंसक तथा क्रूर होते जाते हैं – वे पशुओं के प्रति क्रूर हो जाते हैं और अन्य मनुष्यों के प्रति भी । उन्हें इसका कोई ज्ञान नहीं कि एक दूसरे से किस प्रकार व्यवहार किया जाय । आसुरी लोगों में पशु वध अत्यन्त प्रधान होता है । ऐसे लोग संसार के शत्रु समझे जाते हैं, क्योंकि वे अन्ततः ऐसा अविष्कार कर लेंगे या कुछ ऐसी सृष्टि कर देंगे जिससे सबका विनाश हो जाय । अप्रत्यक्षतः यह श्लोक नाभिकीय अस्त्रों के अविष्कार की पूर्व सूचना देता है, जिसका आज सारे विश्र्व को गर्व है । किसी भी क्षण युद्ध हो सकता है और ये परमाणु हथियार विनाशलीला उत्पन्न कर सकते हैं । ऐसी वस्तुएँ संसार के विनाश के उद्देश्य से ही उत्पन्न की जाती हैं और यहाँ पर इसका संकेत किया गया है । ईश्र्वर के प्रति अविश्र्वास के कारण ही ऐसे हथियारों का अविष्कार मानव समाज में किया जाता है – वे संसार की शान्ति तथा सम्पन्नता के लिए नहीं होते ।

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